Last Updated:June 22, 2026, 14:12 IST
आधुनिकता के इस दौर में भी आदिवासी समाज अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है. जिले के ग्राम आमाटोला में प्रकृति, जल और कृषि के देवता ‘भीमाल पेन’ की विवाह रस्म पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ संपन्न कराई गई, ताकि आगामी मानसून में अच्छी बारिश और खेतों में भरपूर फसल हो सके.
कांकेर. आज के इस वैज्ञानिक और आधुनिक युग में जहां लोग चांद-तारों पर घर बसाने की सोच रहे हैं, वहीं भारत के कुछ ग्रामीण अंचलों में आज भी सदियों पुरानी ऐसी परंपराएं जिंदा हैं जिन्हें देखकर आधुनिक दुनिया की आंखें फटी की फटी रह जाएं. प्रकृति को रिझाने और अपनी आस्था को साबित करने के लिए ग्रामीण आज भी ऐसे-ऐसे जतन करते हैं जो न केवल हैरान करते हैं बल्कि इंसानी सोच को एक नए मोड़ पर खड़ा कर देते हैं. एक ऐसा ही दिलकश और चौंकाने वाला मामला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र से सामने आया है, जहां अच्छी बारिश के लिए इंसानों की नहीं बल्कि सीधे देवता की ही शादी करा दी गई.
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अनोखा नजारा जिले के ग्राम आमाटोला में देखने को मिला, जहां आदिम संस्कृति के अनुसार जल, जंगल, जमीन और कृषि के रक्षक माने जाने वाले मुख्य देवता ‘भीमाल पेन’ की शादी पूरे पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराई गई. ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि यदि भीमाल पेन देव खुश रहेंगे, तो आगामी मानसून में इलाके में झमाझम और रिकॉर्ड तोड़ बारिश होगी, जिससे खेतों में भरपूर फसल लहलहाएगी और पूरे अंचल में कभी सूखा या अकाल नहीं पड़ेगा. इसी अटूट भरोसे के कारण पूरे गांव ने मिलकर इस देव-विवाह को किसी राजशाही शादी की तरह धूमधाम से आयोजित किया.
इस देव-विवाह की शुरुआत गांव की महिलाओं और युवतियों द्वारा गाए गए सुरीले और पारंपरिक मांगलिक लोकगीतों से हुई. पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी महिलाएं नाचते-गाते हुए गांव के सबसे बड़े और पवित्र महुआ वृक्ष के नीचे पहुंचीं. वहां गांव के बुजुर्गों और उत्साही युवाओं ने पहले से ही बांस और पत्तों की मदद से एक बेहद खूबसूरत मड़वा (मंडप) तैयार कर रखा था. इसके बाद शादी की मुख्य और गुप्त रस्में शुरू की गईं. सबसे पहले महिलाओं ने भीमाल पेन देव की प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराया और फिर पूरे आदर भाव से सरसों का तेल और हल्दी अर्पित की.
इसके बाद गांव के मुख्य पारंपरिक पुजारी ‘गायता’ ने कमान संभाली और पूरे विधि-विधान के साथ मंत्रोच्चार करते हुए हल्दी चढ़ाने, तेल लगाने और अग्नि के चारों ओर फेरों सहित शादी की सभी जरूरी रस्में संपन्न कराईं. जैसे ही पुजारी ने शादी संपन्न होने की घोषणा की, पूरा आमाटोला गांव ढोल-नगाड़ों, मांदल और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से सराबोर हो उठा. इसके बाद क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या महिलाएं, सभी ने एक-दूसरे का हाथ थामकर सामूहिक नृत्य करना शुरू कर दिया, जिससे पूरा इलाका उत्सव के रंग में डूब गया.
ग्रामीणों का साफ कहना है कि भीमाल पेन केवल उनकी आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे सीधे तौर पर प्रकृति के रक्षक हैं. आज के समय में जहां पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं आदिवासियों की यह अनोखी परंपरा पूरी दुनिया को जल, जंगल और जमीन को सहेजने का एक बड़ा और कड़ा संदेश देती है. सबसे सुखद पहलू यह है कि गांव की नई और पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी भी बिना किसी झिझक के अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को पूरे गर्व के साथ आगे बढ़ा रही है, जिसने इस आयोजन को और भी खास बना दिया है.
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें
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