छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के युवा अब खेती किसानी से अपना भविष्य संवारना चाहते हैं. ऐसे में एक युवक एम कॉम कि पढ़ाई पूरी करने के बाद खेती किसानी में लगा है. दरअसल, एम कॉम की पढ़ाई करने वाले युवक ने प्राइवेट नौकरी तो कि लेकिन उन्हें अच्छा नहीं लगा और फिर सरकारी नौकरी नहीं खोजी बल्कि खेती में मेहनत और लगन दिखाया, जिसका नतीजा यह रहा है कि युवक अब ढाई एकड़ की खेत में बैगन का ग्राफ्टेड पौधा लगाया है और पूरा हाइटेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे पौधे तंदुरुस्त हैं. पौधा युवक ने 20 हजार में लगाया है जो कि रायपुर से लेकर आए हैं. 3 से 4 लाख लगात लगी है, जिसमें फायदा पूरी तरह बैंगन के मार्केट रेट पर निर्भर करता है. अब आप सोच रहे होंगे कि बैगन कहा ट्रांसपोर्ट होकर जाता है तो युवक के बैंगन की डिमांड सबसे ज्यादा यूपी, बिहार और झारखंड में है, देखिए ये रिपोर्ट…
नौकरी छोड़ खेती को बनाया व्यवसाय
मोनू तिवारी ने लोकल 18 को बताया कि उनके पिता शुरू से किसान रहे हैं और बचपन से ही खेती-बाड़ी का माहौल देखने को मिला. हालांकि, परिवार में कोई भी व्यावसायिक स्तर पर सब्जी की खेती नहीं करता था, लेकिन उन्होंने खुद इस दिशा में कदम बढ़ाया. एमकॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ऑटोमोबाइल सेक्टर में करीब 15 वर्षों तक नौकरी की, लेकिन अंततः खेती को ही अपना भविष्य बनाने का फैसला किया.
ढाई एकड़ में लगाए 20 हजार ग्राफ्टेड बैंगन के पौधे
मोनू तिवारी इस बार लगभग दो से ढाई एकड़ क्षेत्र में बैंगन की खेती कर रहे हैं. खेत की तैयारी के लिए गोबर खाद डालकर जुताई कराई गई. उसके बाद बेड तैयार किए गए और आवश्यक बेसल डोज का उपयोग किया गया. इसके बाद ग्राफ्टेड पौधों की रोपाई की गई. उन्होंने बताया कि कुल मिलाकर लगभग 20 हजार पौधे लगाए गए हैं.
अलग-अलग स्थानों से मंगाए उन्नत किस्म के पौधे
किसान ने बताया कि उन्होंने वीएनआर कंपनी की 212 किस्म के ग्राफ्टेड पौधे लगाए हैं. इसके अलावा कुछ पौधे अंबिकापुर के कर्जी फार्म और रायपुर के चावड़ा बाग से भी मंगाए गए हैं. उनका कहना है कि ग्राफ्टेड पौधों की उत्पादकता और मजबूती नॉन-ग्राफ्टेड पौधों की तुलना में काफी बेहतर होती है.
चार-पांच वर्षों से कर रहे बैंगन की खेती
मोनू तिवारी पिछले चार से पांच वर्षों से बैंगन की खेती कर रहे हैं, शुरुआत छोटे पैमाने पर की गई थी, लेकिन लगातार प्रयोग और अनुभव के आधार पर इस बार बड़े स्तर पर ग्राफ्टेड बैंगन की खेती की गई है. उनका कहना है कि आधुनिक तकनीक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किए गए प्रयोग खेती को अधिक लाभकारी बनाते हैं.
गूगल से जानकारी, खेत में खुद का प्रयोग
किसान ने बताया कि आधुनिक खेती से जुड़ी कई जानकारियां इंटरनेट और गूगल के माध्यम से मिल जाती हैं, लेकिन स्थानीय जलवायु और परिस्थितियों के अनुसार खेत में किए गए प्रयोग सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इसी वजह से वे लगातार नई तकनीकों को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं…
तीन से चार लाख रुपये की आई लागत
बैंगन की इस खेती में अब तक खाद, पौधे और अन्य आवश्यक संसाधनों पर लगभग तीन से चार लाख रुपये की लागत आ चुकी है. इसके अलावा मजदूरी और अन्य खर्च अलग हैं. आने वाले दिनों में पौधों को सहारा देने के लिए रस्सी और अन्य व्यवस्थाएं भी करनी होंगी. मोनू तिवारी के अनुसार बैंगन की मांग बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में अच्छी रहती है, वर्तमान में फसल में फल लगना शुरू हो गया है और जल्द ही उत्पादन बाजार में पहुंचने लगेगा.
किसान का मुनाफा बाजार भाव पर निर्भर
मुनाफे के सवाल पर मोनू तिवारी कहते हैं कि खेती में लाभ पूरी तरह बाजार भाव पर निर्भर करता है.यदि किसानों को उचित कीमत मिल जाए तो खेती निश्चित रूप से लाभ का सौदा है. उनका मानना है कि खेती कभी नुकसान नहीं देती, बशर्ते उसे वैज्ञानिक तरीके और सही प्रबंधन के साथ किया जाए.
